Page 43 - Mann Ki Baat Hindi
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“हम ‘जीरो वेस् मैनेजमें्’ करतिे हैं। केले की क्टाई के िटाद, हम केले के तिने कटा
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          इसतिमटाल फटाइिर िनटाने और उस फटाइिर से हैंिीकटाफ् िनटाने के डलए करतिे हैं; और खटान  े
                                                                        ु
          वटाले डहससों से हम पटापड़, अचटार वगैरह िनटातिे हैं। ‘मन की िटाति’ में डजक होनटा एक िहति
                          े
          अचछटा अनुभव ्थटा। लडकन मुझे यह जटानकर हैरटानी हुई डक मोदी सर ने अपने एडपसोि
                                                       ु
                            में मेरटा नटाम डलयटा है। यह मेरे डलए िहति अचछटा पल ्थटा। केंद्रीय
                            मडत्रयों से डमलने के िटाद मुझे िहति खुशी हुई। ऐसे कटाय्षकमों स  े
                             ं
                                                   ु
                            जटागरूकतिटा िढ़तिी है, ्योंडक जि मैंने शुरू डकयटा ्थटा, तिो लोग मेर  े
                            कटाम के िटारे में कुछ नहीं जटानतिे ्थे, लडकन अि मैं जहटाँ भी जटातिटा
                                                       े
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                            हँ, लोग मुझे पहचटानतिे हैं।”
                                                               - वषात्त, कनात्त्टक
                                                (मन की िात के 107वें संसकरण में चचात्त)


            ये प्ररणादायक नागररक एक ऐसे देश की भावना को बदखाते हैं जो अपने ्लोगों की
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            िात सुनता है, उनह पहचानता है और उनका जश्न मनाता है। ‘मन की िात’ स  े
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            ्लेकर ‘गणतंत्र बदवस’ परि तक का उनका सफर एक गहरे बवचार को बदखाता
            है: हर सच्ी कोबशश मायने रखती है, और हर जमीनी गािा एक राष्ट्ीय मंच की
            हकदार है।



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