Page 65 - Mann Ki Baat (Hindi)
P. 65

असली जादू तो रोात में होता है। जैसा वक   वश्कपकारोों  के  वलए  एक  बिा  मंच  है।

               ं
          प्धानमत्री जी ने बता्या, “रोात के सम्य   जब प्यमाटक ्यहाँ आते हैं औरो स्थानी्य
          जब सफ़ेद रोण के ऊपरो चाँदनी िैलती   बािारो से ़िरोीदारोी करोते हैं, तो न वसफ़्फ
                                                          ु
          है, िहाँ का दृश््य अपने-आप में मंत्रमुग्ध   उन्हें  ना्याब  िस्तएँ  वमलती  हैं  बत््कक
          करो देने िाला होता है।”           इससे स्थानी्य कारोीिरोों की रोोिी-रोोटी

              पवणमामा की रोात को ्यहाँ का निारोा   भी परोिान चढ़ती है। ्यह 'िोकल िॉरो
               ू
          ऐसा होता है जैसे िमीन ने सफ़ेद चादरो   लोकल'  का  सबसे  बेहतरोीन  उदाहरोण
                                   ं
          ओढ़ ली हो। ्यह सुकून औरो शावत का   है।
                                                                      ं
          एक ऐसा एहसास है वजसे लफ़्िों में ब्या  ँ  शाम  होते  ही  ्यहाँ  लोक  सिीत
                                                 ृ
                 ु
          करोना मत्श्कल है। ्यहाँ आकरो इंसान   औरो न्व्य की महवफ़ल सजती है। लोक
          अपनी रोोिमरोामा की उलझनों को भूलकरो   कलाकारोों की आिाि औरो िाद् ्यंत्रों की
          प्ककृवत के सौंद्यमा में खो जाता है।  धुन सीधे वदल में उतरोती है। ्यहाँ की

                                 ं
              संस्ककृबत और हुनर का सिम      मेहमानिािी ऐसी है वक आप ़िुद को
                                   ु
              रोण उ्वसि वसफ़्फ प्ाककृवतक संदरोता   प्यमाटक नहीं बत््कक पररोिारो का वहस्सा
          तक  सीवमत  नहीं  है  बत््कक  ्यह  कच्छ   महसूस करोेंिे।
          की विरोासत का भी एक अद भुत आईना      बदलों को जोड़ता एक त्योहार
                               ्
          है।  ्यहाँ  की  बंजरो  िमीन  परो  ्यहाँ  के   रोण उ्वसि वसफ़्फ घूमने-विरोने की

                    ं
          लोि अपने रोिों से जान िूक देते हैं।   जिह नहीं है बत््कक ्यह लोिों के वदलों
                               ँ
          ्यह  उ्वसि  स्थानी्य  कलाकारोों  औरो   को जोिने का काम करोता है। जैसा वक
























                                        65
                                        65
                                        65
   60   61   62   63   64   65   66   67   68   69   70