Page 57 - Mann Ki Baat - Hindi
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          अग्रजों  ने  ड़कसानों  पर  तीन  कड़ठिया   रॉ.  राजनद्र  प्साद  का  दसतावेज़  :
          प्णाली के तहत जबरन नील की खेती    ‘चमपारण में सतयाग्रह’
          थोप रखी थी, ड़जससे वे कज्द में रूबत  े  इस  आंदोलन  के  एक  प्मुख
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          जा रहे थे और उनकी जमीन बंजर हो    सतभ  थे  रॉ.  राजनद्र  प्साद,  जो  आग  े
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          रही थी।                           चलकर भारत के पहले राष्ट्रपड़त बने।
              जब महातमा गाँधी चमपारण पहँचे,   उनकी पुसतक ‘चमपारण में सतयाग्रह’
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          तो  उनहोंने  वहाँ  केवल  शोषण  नहीं,   केवल इड़तहास नहीं, बकलक ड़वरोध की
          बकलक सतयाग्रह की शक्त को परखन  े  उदघोषणा है। उनहोंने ड़कसानों की पीड़ा,

          का  अवसर  देखा।  ड़कसानों  ने  काँपती   गाँधीजी  की  रणनीड़त  और  एकजुट
          आवाज़  में  कहा,  “हमारी  ज़मीन  मर   संघष्द को सजीव रूप में ड़चड़त्रत ड़कया।
          रही है, खाने को कु् नहीं।” गाँधीजी न  े  आज  के  युवाओं  के  ड़लए  यह
          ड़कसानों की वयथा को देश की आवाज़   पुसतक एक ड़दशा-सूचक यंत्र है, जो यह
          बनाया।                            बताती है- बदलाव तब आता है जब आम
              गाँधीजी  ने  शाड़तपण्द  प्ड़तकार,   लोग खड़े होते हैं। रॉ. प्साद के शबदों में :
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          साक्य-संग्रह  और  ड़गरफतारी  को       “सवतंत्रता  दी  नहीं  जाती,  उसे  व  े
          हड़थयार बनाया। सरकार को ड़कसानों    लोग हाड़सल करते हैं जो उसे पाने का
          की एकता के सामने झुकना पड़ा और     साहस रखते हैं।”

          अंततः  नील  की  जबरन  खेती  समापत    जड़लयाँवाला बाग नरसंहार (1919) :
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          करनी पड़ी। यह केवल एक जीत नहीं     अप्ल में खून से रंगी धरती
          थी- यह संदेश था ड़क नड़तक साहस स  े    चमपारण के दो साल बाद, 13 अप्ल
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          साम्राजय ड़हल सकते हैं।            1919, भारत के इड़तहास में सबसे काल  े






















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