Page 44 - Man Ki Baat Nov 2024 (Hindi)
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उदघाटन  के  हदन  मैंने  सभी  छोट़े
                                          बच्ों को इकट्ा हकया औि प्रतयक को
                                                                  े
                                          हमठाई का एक हर्बा हदया। मैंने किा,
                                          ‘आज आप इस हमठाई का आनंद लेंग  े
                                          औि यि जलद िी ख़तम िो जाएगी। आप
                                               े
                                          कुछ दि इसका आनंद लेंगे औि भूल
                                                  े
                                          जाएँगे,  लहकन  अगि  आप  मीठी  यादें
                                          बनाते िैं, तो वे िमेशा आपके साथ ििेंगी।
                                          इसहलए इस जगि का उपयोग उन पलों
                                          को बनाने के हलए किें, हजनिें आप बड़े
                                          िोने के बाद भी सँजोकि िखेंगे।’
                                                     ु
                                              गहम्ययाँ शर िो ििी थीं औि बच्ों
                                          ने  गमदी  से  बचने  के  हलए  पुसतकालय
                                          का  उपयोग  किना  शर  कि  हदया।
                                                            ु
                                          जैसे-जैसे तापमान बढ़ता गया, अहधिक
                                                   ु
                                          बच्  इन  सहवधिाओं  का  उपयोग  किन  े
                                             े
                                          के  हलए  आकहष्यत  िुए।  लेखन  ऱेसक,
                                          िचनातमक  पठन  औि  अनय  सहवधिाए  ँ
                                                                   ु
                                          सभी का उपयोग हकया जा ििा था।
                                              लाइब्ेिी िमेशा बच्ों से भिी ििती
                                          थी  औि  गहम्ययों  के  अंत  में,  मैंने  देखा
                                          हक नई हकताबें पिानी िो गई थीं, लेखन
                                                       ु
                                          ऱेसक पि अहधिक भीड थी औि गहतहवहधि
                                          पुसतकों की भािी माँग थी।
                                              मैं  मानसून  की  शुरुआत  में  हफि
                                                            े
                                                              े
                                          विाँ गई। तब कुछ बच् मिे पास आए
                                          औि उनिोंने मुझसे किा, “अममा, कृपया
                                          पुसतकालय बंद न किें। यि िमें बिुत
                                          पसंद िै। सकूल के बाद िम यिाँ आना
                                          चािते िैं। िमें औि हकताबें हदलवाएँ। तीन
                                          मिीनों में िमने बिुत कुछ सीखा िै।”
                                              इन युवाओं ने जब मुझे किानी की
                                          ढ़ेि सािी हकताबें उपिाि में दीं तो मुझ  े
                                          सुखद आशचय्य िुआ। एक ने किा, “मैं



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