Page 44 - Mann Ki Baat Hindi
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मोटापा - िज़न से कहीं अधिक








                                              स्ास्थ्  और  क््ाण  पर  ्ह
                                          ्लश्क  ध्ान  इसदलए  ग्ा  क्ोंदक
                                           ै
                                          1990 के िशक से अब तक व्सकों में
                                          मोटापे की िर िोगुनी से अदधक हो गई
                                          है, जबदक बच्ों में ्ह िर चार गुना बढ़ी
                                          है। खासतौर पर द्कासशील िेशों जैसे
                                          भारत में बच्ों में मोटापे की ्दद्ध सबसे
                                                                ृ
                 रुजुता दि्ेकर            अदधक रही है।
                  पोर्ण द्शेर्ज्ा             1993  में,  बैरी  पॉपदकनस,  जो  एक
                                          पोर्ण द्शेर्ज्ा हैं, ने मोटापे और उससे
                                          जुड़ी पाचन समबंधी बीमारर्ों की बढ़ती
                                          िर को समझाने के दलए एक रूपरेखा
                                          प्सतुत  की,  दजसे  ‘पोर्ण  संरिमण
                                          मॉडल’ (Nutrition Transition Model) कहा
                                          जाता है। ्ह मॉडल बताता है दक आहार
                                          पैटनमा धीरे-धीरे सथानी् और पारमपररक
                                          भोजन  से  बिलकर  अदधक  ‘पलशचमी
                                          शैली’  के  आहार  की  ओर  बढ़  रहा  है,
                                                                   कू
            हमारे  शासत्र  हमें  दसखाते  हैं  दक   दजसमें  पैकेजड  और  प्ोसेसड  फड  की
        ‘अन्न ही आनंि’ का मागमा है, जो मान्   अदधकता होती है। इस बिला् को हम
        जी्न का ्ासतद्क स्रूप है। ्दि ्ह   अपने जी्न में भी िेख सकते हैं। पहले
        दकसी  भी  प्ाचीन  संसकदत  की  शाश्त   जब हम परीक्ा में पास होते थे तो लड्डू
                          कृ
        दशक्ा है, तो सं्ुकत राष्ट् के सत्रह सतत   बाँटते थे, अब चॉकलेट िेते हैं। जनमदिन
                                                  ं
                                                                      कू
        द्कास  लक््  (SDGs)  भी  इसी  से  मेल   क्ेत्री्  व्जनों  के  बजा्  फासट-फड
        खाते हैं। इन लक््ों में से शीर्मा तीन में   रेसतरां में मनाने लगे हैं।
        िो लक्् भोजन, स्ास्थ् और समपूणमा      जैसे-जैसे  हमारी  आबािी  अदधक
                                           ै
        क््ाण से जुड़े हुए हैं।            ्लश्क और शहरी होती जा रही है, न

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