Page 55 - Mann Ki Baat (Hindi)
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पािमाती विररो (19 जनिरोी, 1926 - 17
अिस्त, 1995) को मानि जावत के प्वत
उनकी वनस्िाथमा सेिा के कारोण 'पत्श्चमी
ओवडशा की मदरो टेरोेसा' कहा जाता है।
िे अपने चाचा रोामचंद्र विररो के साथ
वब्वटश शासन के विरुद् रोणनीवत बना रोहे
कांग्स नेताओं की बैठकों में जा्या करोती
े
थीं। उन्होंने 11 िषमा की आ्यु में ही स्कूल
छोि वद्या था।
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अपना परोा जीिन स्ितंत्रता सग्ाम औरो
सामावजक का्यषों के वलए समवपमात करोने
हेतु 1938 में उन्होंने घरो छोि वद्या।
1940 में, उन्होंने िाँि-िाँि घूमकरो लोिों
को िाँधीजी के खादी आंदोलन में शावमल
े
होने के वलए प्ररोत वक्या। उन्होंने स्ि्यं
बुनाई औरो हस्तवश्कप की कला सीखी।
उन्हें दो साल जेल की सिा हुई क््योंवक
उन्होंने बरोिढ़ के एसडीओ की कुसथी परो
न््या्याधीश की तरोह बैठकरो अपने साथ
मौजूद लिकों को एसडीओ को रोस्सी से
बाँधने का आदेश वद्या था, जैसे वक िह
कोई अपरोाधी हो।
एक बारो िे बरोिढ़ की अदालत में िईं
औरो िकीलों को अदालत खाली करोने
औरो कानून के मामलों में अंग्ेिों के साथ
सह्योि बंद करोने का आदेश वद्या।
ं
स्ितंत्रता सग्ाम औरो समाज के प्वत उनके
्योिदान के वलए, वजसमें ओवडशा में 1951
के अकाल का सम्य भी शावमल है, 1984
में उन्हें समाज क्क्याण विभाि द्ारोा
पुरोस्कारो से सम्मावनत वक्या ि्या औरो
1988 में उन्हें सम्बलपुरो विश्िविद्ाल्य
से डॉक्टरोेट की मानद उपावध भी प्ाप्त
हुई थी।
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