Page 28 - Mann Ki Baat Hindi
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स्त्री-पुरुष समानता की प्बल समर्थक



                                                  हसा ज्रीिराज मेहता
                                                    ं



                                              दसतमबर  1919  में,  एक  22  ्र्जी्
           सादथ्ो,  हंसा  मेहताजी  ने  हमार  े
           राष्ट्ी्  ध्ज  के  दनमामाण  से  लेकर   गुजराती  मदहला  ने  अपने  ्ुग  की
                                                                ं
        उसके दलए बदलिान िेने ्ाली िेश-भर   परमपराओं को तोड़ते हुए लिन सककूल
        की  मदहलाओं  के  ्ोगिान  को  सामन  े  ऑफ  इकोनॉदमकस  में  अपनी  पढ़ाई
        रखा  था।  उनका  मानना  था  दक  हमार  े  जारी रखने के दलए समुद्र पार करके
        दतरंगे में केसरर्ा रंग से भी ्े भा्ना   दब्टेन  की  ्ात्रा  की।  उस  सम्  की
        उजागर होती है। उनहोंने द्श्ास व्कत   मदहलाओं के दलए ्ह बहुत ही असमभ्
        दक्ा  था  दक  हमारी  नारी-शलकत  भारत   सी बात थी। इदतहास में एक राष्ट््ािी,
        को सशकत और समृद्ध बनाने में अपना   अग्णी  नारी्ािी  और  भारत  में  सह-
            ू
        बहुम्् ्ोगिान िेगी – आज उनकी      दशक्ा  द्श्द्द्ाल्  की  कुलपदत  के
        बातें सच सादबत हो रही हैं।
                                          रूप में बाधाओं को तोड़ने ्ाली पहली
                   – प्धानमंत्री नरेनद्र मोिी   मदहला के रूप में ्ह नाम था ‘जी्राज
               (‘मन की बात’ समबोधन में )
                                          हंसा मेहता’।
                                              गुजरात  में  1897  में  जनमी,  हंसा
                                          मेहता का पालन-पोर्ण ऐसे प्गदतशील
                                          माहौल  में  हुआ,  जहाँ  दशक्ा  और
                                          स्तंत्र  द्चारों  को  प्ोतसादहत  दक्ा
                                          ग्ा।  उनहोंने  बड़ौिा  कॉलेज  में  उच्
                                          दशक्ा  प्ापत  की  और  बाि  में  इंगलैंड
                                          में  पत्रकाररता  तथा  समाजशासत्र  का
                                          अध््न  दक्ा।  लोकतंत्र  और  सत्री-
                                          पुरुर्  समानता  पर  ्लश्क  द्चारों
                                                            ै
                                                              ृ
                                          ने भारत के प्दत उनके िलष्टकोण को
                                          प्भाद्त  दक्ा।  ्ापस  लौटने  पर  ्ह
                                          महातमा गाँधी के स्-शासन के आह्ान
                                              े
                                          से  प्ररत  होकर  स्तंत्रता  संग्ाम  में
                                          शादमल हो गईं। उनहोंने द्रोध प्िशमानों
                                          में सदरि् रूप से भाग दल्ा, मदहलाओं
                                          को संगदठत दक्ा और भारती् समाज


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