Page 7 - MKV (Hindi)
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          के अवसर बहुत चमलते ही रहते हैं, लचकन   हँ। मुझे लगत़ा ही नहीं है चक मैं आपस  े
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          2014 में च्लली आने के ब़ा् मैंने प़ाय़ा   िोड़़ा भी ्ूर हँ। मेरे चलए ‘मन की ब़ात’
          चक यह़ाँ क़ा जीवन तो बहुत ही अलग है।   ये एक क़ाय्वक्रम नहीं है, मेरे चलए एक
          क़ाम क़ा सवरप अलग, ़्ाचयतव अलग,   आसि़ा, पूज़ा, व्रत है। जैसे लोग, ईशवर
          ससिचतय़ां-पररससिचतयों  के  बंधन,  सुरक़्ा   की  पूज़ा  करने  ज़ाते  हैं,  तो  प्रस़ा्  की
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          क़ा त़ामझ़ाम, समय की सीम़ा। शुरुआती   ि़ाल ल़ाते हैं। मेरे चलए ‘मन की ब़ात’
          च्नों  में,  कु्  अलग  महसूस  करत़ा   ईशवर रपी जनत़ा जऩा््वन के िरणों में
          ि़ा,  ख़ाली-ख़ाली  स़ा  महसूस  करत़ा   प्रस़ा्  की  ि़ाल  की  तरह  है।  ‘मन  की
          ि़ा। पि़ासों स़ाल पहले मैंने अपऩा घर   ब़ात’ मेरे मन की आधय़ासतमक य़ात्ऱा बन
          इसचलए नहीं ्ोड़़ा ि़ा चक एक च्न अपन  े  गय़ा है।
          ही ्ेश के लोगों से समपक्क ही मसशकल    ‘मन की बात’ स्व से समष्टि
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          हो ज़ाएग़ा। जो ्ेशव़ासी मेऱा सब कु् हैं,   की यात्ा है।
          मैं उनसे ही कि करके जी नहीं सकत़ा     ‘मन की बात’ अहम् से ्वयम्
          ि़ा। ‘मन की ब़ात’ ने मुझे इस िुनौती क़ा     की यात्ा है।
          सम़ाध़ान च्य़ा, स़ाम़ानय म़ानवों से जुड़न  े  यह तो मैं नहीं, तू ही इसकी
          क़ा ऱासत़ा च्य़ा। प्भ़ार और प्रोिोकॉल    संसकार साधना है।
          वयवसि़ा  तक  ही  सीचमत  रह़ा  और
          जनभ़ाव, कोचि-कोचि जनों के स़ाि, मेर  े  आप  कलपऩा  कररए,  मेऱा  कोई
          भ़ाव, चवशव क़ा अिटूि अंग बन गय़ा। हर   ्ेशव़ासी 40-40 स़ाल से चनज्वन पह़ाड़ी और
          महीने मैं ्ेश के लोगों के हज़ारों सन्ेशों   बंजर जमीन पर पेड़ लग़ा रह़ा है, चकतन  े
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          को  पढ़त़ा  हँ,  हर  महीने  मैं  ्ेशव़ाचसयों   ही लोग 30-30 स़ाल से जल-संरक्ण के
          के एक से एक अ् भुत सवरप के ्श्वन   चलए ब़ावचड़य़ाँ और त़ाल़ाब बऩा रहे हैं,
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          करत़ा हँ। मैं ्ेशव़ाचसयों के तप-तय़ाग की   उसकी  स़ाफ़-सि़ाई  कर  रहे  हैं।  कोई
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          पऱाक़ाष़््ा को ्ेखत़ा हँ, महसूस करत़ा   25-30 स़ाल से चनध्वन बच्ों को पढ़़ा रह़ा
                                            है, कोई गरीबों की इल़ाज में म्् कर
                                            रह़ा है। चकतनी ही ब़ार ‘मन की ब़ात’ में
                                            इनक़ा चजक्र करते हुए, मैं भ़ावुक हो गय़ा
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                                            हँ। आक़ाशव़ाणी के स़ाचियों को चकतनी
                                            ही ब़ार इसे चिर से ररकॉडटि करऩा पड़़ा
                                            है। आज, चप्ल़ा चकतऩा ही कु् आँखों
                                            के स़ामने आए ज़ा रह़ा है। ्ेशव़ाचसयों















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